गाज़ा को लेकर एक बड़ी अंतरराष्ट्रीय खबर सामने आई है। गाज़ा में शांति की कोशिशों के लिए बनाए जा रहे ‘Board of Peace’ में अब 8 इस्लामिक देश शामिल होने जा रहे हैं। इनमें कतर, तुर्किये और पाकिस्तान जैसे अहम देश भी हैं। इन देशों के विदेश मंत्रियों ने मिलकर एक बयान जारी किया है, जिसमें गाज़ा में युद्ध रोकने, लोगों की मदद करने और लंबे समय तक शांति कायम करने की बात कही गई है। यह फैसला ऐसे वक्त पर आया है जब पूरी दुनिया गाज़ा में जारी तबाही और मानवीय संकट को देख रही है।
लेकिन इस खबर के साथ तीन बहुत ज़रूरी सवाल खड़े होते हैं।
पहला सवाल — आखिर यह Board of Peace है क्या, और इसकी ज़रूरत क्यों पड़ी?
दूसरा सवाल — 8 इस्लामिक देशों का इसमें शामिल होना क्या सच में गाज़ा में शांति ला पाएगा?
तीसरा सवाल — इस पूरी पहल का दुनिया और भारत पर क्या असर पड़ेगा?
इन तीनों सवालों के जवाब हम इस वीडियो में आसान भाषा में समझेंगे।
पिछले डेढ़ साल से गाज़ा लगातार युद्ध और तबाही झेल रहा है। इज़रायल और हमास के बीच लड़ाई में गाज़ा का बड़ा हिस्सा तबाह हो चुका है। हज़ारों लोग मारे गए हैं, लाखों लोग अपने घर छोड़ने पर मजबूर हुए हैं और खाने, पानी और इलाज जैसी बुनियादी चीज़ों की भारी कमी है। संयुक्त राष्ट्र और बड़ी ताकतों ने कई बार युद्ध रोकने की कोशिश की, लेकिन कोई स्थायी हल नहीं निकल पाया। यहीं से यह बात सामने आई कि मौजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था गाज़ा जैसे मामलों में शायद उतनी असरदार नहीं रह गई है।
इसी हालात में ‘Board of Peace’ का विचार सामने आया। इसे एक ऐसे अंतरराष्ट्रीय मंच के तौर पर पेश किया गया है जो गाज़ा में युद्ध रुकवाने, बाद में दोबारा निर्माण कराने और आगे की राजनीतिक व्यवस्था तय करने में मदद करेगा। इस बोर्ड में शामिल देश सिर्फ बातचीत ही नहीं करेंगे, बल्कि पैसे, राहत सामग्री और ज़मीनी मदद भी देंगे। यानी यह सिर्फ बातें करने वाला मंच नहीं, बल्कि काम करने का दावा करता है।
अब बात करते हैं उन 8 देशों की जो इसमें शामिल हो रहे हैं — सऊदी अरब, कतर, मिस्र, जॉर्डन, इंडोनेशिया, तुर्किये, पाकिस्तान और UAE। ये सभी देश मुस्लिम दुनिया और मध्य पूर्व की राजनीति में बड़ा रोल निभाते हैं। इन देशों का कहना है कि गाज़ा को अब और युद्ध नहीं चाहिए, बल्कि शांति, दोबारा बसावट और एक सुरक्षित भविष्य चाहिए। पाकिस्तान का इसमें शामिल होना इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि वह लंबे समय से फिलिस्तीन का समर्थन करता आया है और अब उसे इस मंच के ज़रिए एक नई भूमिका मिल रही है।
लेकिन यह पहल जितनी उम्मीद जगाती है, उतने ही सवाल भी खड़े करती है। कुछ देशों को डर है कि यह Board of Peace कहीं संयुक्त राष्ट्र की ताकत को कमजोर न कर दे। यूरोप के कई देशों ने इससे दूरी बना रखी है। चीन का कहना है कि संयुक्त राष्ट्र को शामिल किए बिना किसी भी शांति योजना का समर्थन करना मुश्किल है। आलोचक यह भी कह रहे हैं कि यह पहल शांति से ज़्यादा दुनिया की राजनीति में ताकत का नया खेल बन सकती है।
अगर दुनिया पर इसके असर की बात करें, तो तस्वीर दो तरह की हो सकती है। अगर यह बोर्ड सही तरीके से काम करता है, तो गाज़ा में लंबे समय के लिए युद्ध रुक सकता है, लोगों को राहत मिल सकती है और पूरा इलाका धीरे-धीरे स्थिर हो सकता है। लेकिन अगर यह मंच राजनीति और मतभेदों में फँस गया, तो हालात और बिगड़ सकते हैं और मध्य पूर्व में तनाव बढ़ सकता है।
अब बात भारत की। भारत की नीति हमेशा संतुलन की रही है। भारत के इज़रायल के साथ अच्छे रिश्ते हैं, लेकिन साथ ही भारत फिलिस्तीन का भी समर्थन करता रहा है और अरब देशों के साथ उसके गहरे आर्थिक संबंध हैं। मध्य पूर्व में लाखों भारतीय काम करते हैं और भारत अपनी ज़्यादातर ऊर्जा ज़रूरतें इसी इलाके से पूरी करता है। इसलिए गाज़ा में शांति भारत के लिए भी बहुत ज़रूरी है।
और राहत लेकर आएगी, या फिर यह भी एक अधूरी कोशिश बनकर रह जाएगी।
A major international news story has emerged regarding Gaza. Eight Islamic countries are now set to join a ‘Board of Peace’ being created to promote peace efforts in Gaza. These include important countries like Qatar, Turkey, and Pakistan. The foreign ministers of these countries have issued a joint statement calling for an end to the war in Gaza, providing aid to the people, and establishing lasting peace. This decision comes at a time when the entire world is witnessing the ongoing devastation and humanitarian crisis in Gaza.
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